रविवार 28 जून 2026 - 18:19
कर्बला का मक़सद: इमाम (अ) की सेना के लिए तैयारी

जैसे ही मोहर्रमुल हराम का महीना शुरू होता है, हर ओर ग़म और अज़ा का माहौल छा जाता है। वर्षों से हम ग़म-ए-हुसैन (अ) से परिचित हैं, काले वस्त्र पहनते हैं और हर आँख अश्कबार दिखाई देती है। लेकिन क्या कभी आपके मन में यह प्रश्न उठता है कि हम इतने वर्षों से यह शोक आखिर क्यों मना रहे हैं?

लेखिका: रबाब फ़ातिमा, जामिआ अल-मुस्तफ़ा, कराची

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी। जैसे ही मुहर्रमुल हराम का आगमन होता है, हर ओर शोक और अज़ादारी का वातावरण बन जाता है। वर्षों से हम इमाम हुसैन (अ) के ग़म से जुड़े हुए हैं, काले कपड़े पहनते हैं और हर आँख नम दिखाई देती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह सिलसिला आखिर क्यों जारी है? कर्बला क्यों अस्तित्व में आई? इमाम हुसैन (अ) ने अपने भरे-पूरे परिवार को शांति और सुरक्षा के जीवन से दूर एक रेगिस्तानी क्षेत्र में क्यों ले गए, जहाँ कई दिनों तक भूख और प्यास की कठिनाइयाँ सहनी पड़ीं?

आइए, हम इमाम हुसैन (अ) के उद्देश्य को समझें। कर्बला केवल एक रस्म नहीं है कि हर वर्ष उसे याद कर लिया जाए और फिर अगले मुहर्रम का इंतज़ार किया जाए, या सिर्फ़ सबीलें लगाकर, मर्सिया पढ़कर और मातम करके यह समझ लिया जाए कि हमारी ज़िम्मेदारी पूरी हो गई।

बल्कि कर्बला हमें समाज निर्माण, आत्मनिर्माण, अल्लाह के आदेशों का पालन, इमाम की सही पहचान और शत्रु की पहचान का पाठ पढ़ाती है। यदि इमाम की आज्ञाकारिता का सर्वोत्तम उदाहरण देखना हो, तो हज़रत अब्बास (अ) हमारे आदर्श हैं। यदि उच्च चरित्र वाले युवाओं का उदाहरण देखना हो, तो हज़रत अली अकबर और हज़रत क़ासिम (अ) हमारे आदर्श हैं। कर्बला का अर्थ है समय के इमाम के लिए समर्पित सैनिक तैयार करना। कर्बला अपने भीतर ऐसा महान संदेश समेटे हुए है, जिसे आज लेबनान और ईरान ने अपनाया और अपने समय के यज़ीदों को ललकारा। आज यदि कोई अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाता है, तो वास्तव में यह कर्बला की ही शिक्षा का प्रभाव है।

आज हमें कर्बला की महान हस्तियों को समझने और अपने जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की अत्यंत आवश्यकता है। इमाम (अ) के सभी साथियों के हृदय इमाम के प्रेम और उनकी पहचान से परिपूर्ण थे। आज हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारे व्यक्तित्व से इमाम की शिक्षाओं और उनके चरित्र की कितनी झलक दिखाई देती है।

यदि हमने वास्तव में कर्बला के उद्देश्य को समझ लिया होता, तो आज हमारे समय के इमाम इतनी लंबी अवधि से पर्दा-ए-ग़ैबत में न होते। हम पूर्व इमाम के ग़म में तो आँसू बहाते हैं, लेकिन अपने वर्तमान इमाम की तन्हाई और ग़ुरबत से परिचित नहीं हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इमाम-ए-ज़माना (अ) की तन्हाई को महसूस करें और स्वयं से पूछें कि यह मुहर्रम मेरे व्यक्तित्व और मेरे जीवन में कितना परिवर्तन ला रहा है?

कर्बला को केवल रस्मों और परंपराओं तक सीमित रखना उचित नहीं है। कहीं ऐसा न हो कि इमाम की "क्या कोई है जो हमारी सहायता करे?" की पुकार बुलंद हो रही हो और हम अपनी सांसारिक व्यस्तताओं में इतने डूबे हों कि उस पुकार को सुनने से ही वंचित रह जाएँ।

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें इमाम-ए-ज़माना (अ) के सच्चे सहायकों में शामिल करे और हमें इमाम हुसैन (अ) के उद्देश्य पर चलने की तौफ़ीक़ प्रदान करे।

ऐ अल्लाह! हुसैन (अ) के सदक़े अपने वली के ज़ुहूर (प्रकट होने) में शीघ्रता फ़रमा।

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